अगर कोई मुसलमान बुत परस्ती करे तो शरीअत का क्या हुक्म है❓
*فقيــــر محمــــد امتيــــــــاز قمــــر رضـــوى امجــدى*
*सवाल*क्या फरमाते हैं मुफ्तियान ए किराम इस मसअले के बारे में की ज़ैद जो कि खुद को मुसलमान कहलाता है उसके बावजूद एलानिया तौर पर बुत परस्ती करता है, ज़ैद ने अपने खर्च पर एक मस्जिद में हाफिज़ भी रखा है जो बच्चों को इब्तिदाई दीनी किताबें पढ़ाने का काम अंजाम देते हैं, हाफिज़ साहब का खाना भी ज़ैद के घर से आता है, दरियाफ्त तलब अमर यह है कि ज़ैद के बारे में हुक्मे शरअ क्या है ? नीज़ हाफिज़ साहब का ज़ैद से उजरत लेना और उनके घर का खाना खाना कैसा है❓*
*साईल, आरिफ हुसैन रज़वी बदायूं शरीफ (यूपी)*
*जवाब,, सुरते मसउला में शख्स मज़कूर बुत परस्ती यानी बूतों की पूजा करने की वजह से मुर्तद है, उसका तलबा ए दजवाब-ो पढ़ाने के लिए हाफिज़ साहब को तनख्वाह देना और खाना खिलाना नफा बख्श नहीं, क्योंकि इस्लाम व कुफ्र में वास्ता नहीं, एक शख्स या तो मुसलमान होगा या काफिर,*
*अल्लाह एक है उसका कोई शरीक नहीं कुरान शरीफ में है लाशरीका लहू (لا شریک لہ)*
(सुरह दहर इनआम:१६३)
*💫 इबादत सिर्फ उसी की है, बूतों को पूजना नस्से क़तई के खिलाफ है, सुर ए फातिहा में है इय्याका नअबुदु (ایاک نعبد)*
*खज़ाइनुल इरफान में है*
*अल्लाह तआला के सिवा इबादत किसी के लिए नहीं हो सकती, अल्लाह के अलावा किसी दूसरे की इबादत शिर्क है,*
*कुरान शरीफ में है*
*یا ایھا الناس اعبدوا ربکم الذی خلقکم*
(सुरह बक़रा :२१)
*फतावा रज़विया में है*
*ना एक शख्स के एक वक़्त में दो दीन हो सकें,*
*فإنّ الکفر والإسلام علی طرفي النقیض بالنسبۃ إلی الإنسان لا یجتعمان أبداً ولا یرتفعان، قال تعالی: { اِمَّا شَاكِرًا وَّ اِمَّا كَفُوْرًا*
(सुरह दहर:३)
*وقال تعالی: { مَا جَعَلَ اللّٰهُ لِرَجُلٍ مِّنْ قَلْبَیْنِ فِیْ جَوْفِهٖۚ-}*
(अल अहज़ाब:४)
(फतावा रज़विया जिल्द ६ सफा ७१२)
*والله و رسولہ اعلم بالصواب*
*अज़ क़लम ,हज़रत अल्लामा व मौलाना मोहम्मद इम्तियाज़ क़मर रिज़वी अमजदी साहब किबला मद्दज़िल आली वन्नूरानी (गिरिडीह झारखंड इंडिया)*
*हिंदी ट्रांसलेट मोहम्मद रिज़वानुल क़ादरी सेमरबारी (दुदही कुशीनगर उत्तर प्रदेश)*
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